बछड़े की देखभाल कैसे करें ?

बछड़े की देखभाल कैसे करेंबछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में अच्छी तरह से होना काफी महत्वपूर्ण है क्योकि आज की बछड़ी या बछड़ा कल की होने वाली गाय-भैंस या बैल है। जन्म से ही बछड़ी या बछड़ा सही देखभाल रखने से भविष्य में वह अच्छी गाय-भैंस या बैल बन सकती है। अगर बचपन से बछड़े या बछड़ी स्वस्थ होतें हैं तो उनका वजन लगातार तेजी से बढ़ता है और वो सही समय पर गाय-भैंस या बैल बन जातें हैं ।अंततोगत्वा पशुपालक भाइयों का खर्च उनके पोषण पर कम आता है और सही समय पर दूध और आमदनी देने लायक हो जातें हैं ।

पशुपालक भाई इस बात का हमेशा ध्यान रखें की नवजात बछड़ी या बछड़ा का रखरखाव उनके जन्म के साथ नहीं वरन् जन्म से पूर्व ही मां के गर्भ में शुरू हो जाता है। गर्भावस्था की अंतिम तृतीय अवधि में गर्भस्थ शिशु का सबसे अधिक और तेजी से विकास होता है। जिसके लिए उसे उचित पोषण की आवष्यकता होती है। चूंकि गर्भावस्था में मां ही शिशु के पोषण का एकमात्र साधन होती हैअत: इस अवधि में मां को मिलने वाला भोजन ही गर्भस्थ में शिशु विकास की दर को निर्धारित करता है। पशुपालकों का चाहिए कि वे इस अवधि में गर्भित गाय-भैंस को उचित पोषण प्रदान करें। इस समय मां को उच्च गुणवत्ता वाला तथा पोषक तत्वों से युक्त हरा चारा उपलब्ध कराएं। साथ ही 2-3 कि.ग्रा. संतुलित दाना निर्वाह हेतु दिया जाना चाहिएपरन्तु बच्चा देने की अपेक्षित तिथि से एक सप्ताह पूर्व दाने की मात्रा कम कर देनी चाहिए ताकि पशु को अपच अथवा बच्चा फंस जाने जैसी समस्याओं का सामना न करना पड़े।  बच्चा देने की अपेक्षित तिथि से लगभग एक अथवा दो सप्ताह पूर्व गर्भित मां को बच्चा देने वाले बाड़े में (धुला हुआसूखा तथा बिछाली युक्त) बांध देना चाहिए।

बछड़े या बछड़ी की देखभाल बचपन में कैसे करें ?

जन्म के ठीक बाद बछड़ी या बछड़ा के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें। आमतौर पर गाय-भैंस, बछड़ी या बछड़ा को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़ी या बछड़ा के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय-भैंस, बछड़ी या बछड़ा को न चाटे तो ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें।

नाभ के नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काट कर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए। बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिल्कुल साफ और सूखा रखना चाहिए। बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए। गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफ कर सुखाएं।बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो बछड़े या बछड़ी को दूध पिने में मदद करें।

बछड़े या बछड़ी का भोजन :

नवजात बछड़े या बछड़ी को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध, अर्थात् खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े या बछड़ी के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े या बछड़ी के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है। यह बछड़े या बछड़ी को आवश्यक प्रतिपिंड भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े या बछड़ी को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़े या बछड़ी वनस्पति से प्राप्त मांड और शर्करा को पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े या बछड़ी को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है। बछड़े या बछड़ी को दिए जाने वाले किसी भी द्रव आहार का तापमान लगभग कमरे के तापमान अथवा शरीर के तापमान के बराबर होना चाहिए।

बछड़े या बछड़ी को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बरतनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।

बछड़ा या बछड़ी के लिये स्वच्छ पानी का महत्व :

ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े या बछड़ी को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बरतनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें।पानी को विशुद्ध और रोगाणु तत्वों को हटाने के लिये आप पानी में Aquacure एक्वाक्योर मिला सकतें हैं।

बछड़े या बछड़ी को खिलाने की व्यवस्था :

बछड़े या बछड़ी को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है:

  • बछड़े या बछड़ी को पूरी तरह दूध पर पालना।
  • मक्खन निकाला हुआ दूध देना।
  • दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा छाछ, दही का मीठा पानी, दलिया इत्यादि देना।
  • दूध के विकल्प देना।
  • काफ स्टार्टर देना।
  • पोषक गाय का दूध पिलाना।
  • पूरी तरह दूध पर पालना।

50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है:

पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन) : 1.60 Kg.

सूखा पदार्थ (डीएम) : 1.43 Kg.

कच्चे प्रोटीन : 315 Kg.

इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर 3 महीने की उम्र में डेढ किलो तक दिया जा सकता है।यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है। 3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।

बछड़े या बछड़ी को को दिया जाने वाला मिश्रित आहार :

बछड़े या बछड़ी को का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े या बछड़ी को का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।

जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहर में 10% तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है।

 चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट Chelated Growmin Forte बछड़े को नियमित रूप से दें .उचित विकाश तथा स्वस्थ रखने हेतु यह मिनरल -मिक्चर काफी फायदेमंद और लाभप्रद हैं

नवजात बछड़े या बछड़ी को के लिए रेशेदार पदार्थ खाने को दें । अच्छे किस्म के तनायुक्त पत्तेदार सूखे दलहनी पौधे छोटे बछड़े के लिए रेशे का अच्छा स्रोत हैं। दलहन, घास और पुआल का मिश्रण भी उपयुक्त होता है। धूप लगाई हुई घास जिसकी हरियाली बरकरार हो, विटामिन-ए, डी तथा बी-कॉम्प्लैक्स विटामिनों का अच्छा स्रोत होती है।

6 महीने की उम्र में बछड़े या बछड़ी 1.5 से 2.5 किग्रा तक सूखी घास खा सकता है। उम्र बढने के साथ-साथ यह मात्रा बढ़ती जाती है।

6-8 सप्ताह के बाद से थोड़ी मात्रा में साइलेज़ अतिरिक्त रूप से दिया जा सकता है। अधिक छोटी उम्र से साइलेज़ खिलाना बछड़े में दस्त का कारण बन सकता है।

बछड़े या बछड़ी के 4 से 6 महीने की उम्र के हो जाने से पहले तक साइलेज़ को रेशे के स्रोत के रूप में उसके लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।

मक्के और ज्वार के साइलेज़ में प्रोटीन और कैल्शियम पर्याप्त नहीं होते हैं तथा उनमें विटामिन डी की मात्रा भी कम होती हैं।

पोषक गाय के दूध पर बछड़े या बछड़ी को पालना :

2 से 4 अनाथ बछड़े या बछड़ी को दूध पिलाने के लिए उनकी उम्र के पहले सप्ताह से ही कम वसा-युक्त दूध देने वाली और दुहने में मुश्किल करने वाली गाय को सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। सूखी घास के साथ बछड़े को सूखा आहार जितनी कम उम्र में देना शुरू किया जाए उतना अच्छा। इन बछड़ों का 2 से 3 महीने की उम्र में दूध छुड़वाया जा सकता है।

बछड़े या बछड़ी को दलिए पर पालना :

बछड़े या बछड़ी के आरंभिक आहार (काफ स्टार्टर) का तरल रूप है दलिया। यह दूध का विकल्प नहीं है। 4 सप्ताह की उम्र से बछड़े के लिए दूध की मात्रा धीरे-धीरे कम कर भोजन के रूप में दलिया को उसकी जगह पर शामिल किया जा सकता है। 20 दिनों के बाद बछड़े को दूध देना पूरी तरह बंद किया जा सकता है।

काफ स्टार्टर पर बछड़े या बछड़ी को पालना :

इसमें बछड़े को पूर्ण दुग्ध के साथ स्टार्टर दिया जाता है। उन्हें सूखा काफ स्टार्टर और अच्छी सूखी घास या चारा खाने की आदत लगाई जाती है। 7 से 10 सप्ताह की उम्र में बछड़े का दूध पूरी तरह छुड़वा दिया जाता है।

दूध के विकल्पों पर बछड़े को पालना :

यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि नवजात बछड़े के लिए पोषकीय महत्व की दृष्टि से दूध का कोई विकल्प नहीं है। हालांकि, दूध के विकल्प का सहारा उस स्थिति में लिया जा सकता है जब दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों की उपलब्धता बिल्कुल पर्याप्त न हो।

दूध के विकल्प ठीक उसी मात्रा में दिए जा सकते हैं जिस मात्रा में पूर्ण दुग्ध दिया जाता है, अर्थात् पुनर्गठन के बाद बछड़े के शारीरिक वजन का 10%। पुनर्गठित दूध के विकल्प में कुल ठोस की मात्रा तरल पदार्थ के 10 से 12% तक होती है।

बछड़े या बछड़ी का दूध छुड़वाना :

बछड़े या बछड़ी का दूध छुड़वाना सघन डेयरी फार्मिंग व्यवस्था के लिए अपनाया गया एक प्रबन्धन कार्य है। बछड़े या बछड़ी का दूध छुड़वाना प्रबन्धन में एकरूपता लाने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बछड़े या बछड़ी को उसकी आवश्यकता अनुसार दूध की मात्रा उपलब्ध हो और दूध की बर्बादी अथवा दूध का आवश्यकता से अधिक पान न हो।

अपनाई गई प्रबन्धन व्यवस्था के आधार पर जन्म के समय, 3 सप्ताह बाद, 8 से 12 सप्ताह के दौरान अथवा 24 सप्ताह में दूध छुड़वाया जा सकता है। जिन बछड़ों को सांड के रूप में तैयार करना है उन्हें 6 महीने की उम्र तक दूध पीने के लिए मां के साथ छोड़ा जा सकता है।

संगठित रेवड़ में, जहां बड़ी संख्या में बछड़ों का पालन किया जाता है जन्म के बाद दूध छुड़ाना लाभदायक होता है।जन्म के बाद दूध छुड़वाने से छोटी उम्र में दूध के विकल्प और आहार अपनाने में सहूलियत होती है और इसका यह फायदा है कि गाय का दूध अधिक मात्रा में मनुष्य के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है।

दूध छुड़वाने के बाद के बाद के आहार :

दूध छुड़वाने के बाद 3 महीने तक काफ स्टार्टर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जानी चाहिए। अच्छे किस्म की सूखी घास बछड़े को सारा दिन खाने को देना चाहिए। बछड़े या बछड़ी के वजन के 3% तक उच्च नमी वाले आहार जैसे साइलेज़, हरा चारा और चराई के रूप में घास खिलाई जानी चाहिए। बछड़े या बछड़ी इनको अधिक मात्रा में न खा ले इसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इसके कारण कुल पोषण की प्राप्ति सीमित हो सकती है।

बछड़े या बछड़ी की वृद्धि :

बछड़े या बछड़ी की वृद्धि वांछित गति से हो रही है या नहीं इसे निर्धारित करने के लिए वजन की जांच करें। पहले 3 महीनों के दौरान बछड़े या बछड़ी का आहार बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस चरण में बछड़े या बछड़ी का खानपान अगर सही न हो तो मृत्यु दर में 25 से 30% की वृद्धि होती है। गर्भवती गाय को गर्भावस्था के अंतिम 2-3 महीनों के दौरान अच्छे किस्म का चारा और सांद्र आहार दिया जाना चाहिए।

जन्म के समय बछड़े या बछड़ी का वजन 20 से 25 किग्रा होना चाहिए। नियमित रूप से कृमिनाशक दवाई दिए जाने के साथ-साथ उचित आहार दिए जाने से बछड़े की वृद्धि दर 10-15 किग्रा प्रति माह हो सकती है।बछड़े की पाचन छमता बढ़ाने तथा कृमि के प्रकोप से बचाने हेतु उसे ग्रौलिव फोर्ट  Grolive Forte  नियमित रूप से दें ।उचित विकाश तथा स्वस्थ रखने हेतु एमिनो पॉवर Amino Power दें ,ये दोनों टॉनिक काफी फायदेमंद और लाभप्रद हैं ।

बछड़े या बछड़ी को रोजाना सबेरे  शाम  बाड़े  से आजाद  कर खुला छोड़ दिया जाता है ताकि वे दौड़ सकें और उनका व्यायाम हो सके। बछड़े या बछड़ी की  पशु के डाक्टर द्वारा समय-समय पर जांच करवाकर उन्हे टीके लगवाएं और सुस्त या बीमार होने पर समुचित दवा दे। साफ-सफाई रखें। इस प्रकार से बछड़े या बछड़ी का प्रबंधन करें तो किसान भाइयों को निश्चित तौर पर घर से ही अच्छे पशु  प्राप्त हो सकते हैं जिनकी उत्पादकता ज्यादा होती है और उनके पालन  द्वारा पशुपालन व्यवसाय किफायती बन सकता है। ध्यान रहे की सर्वोत्तम पशु ही किफायती पशुपालन और दुग्ध व्यवसाय की बुनियाद है ।

बछड़े या बछड़ी के रहने के स्थान का महत्व :

बछड़े या बछड़ी को अलग बाड़े में तब तक रखा जाना चाहिए जब तक कि उनका दूध न छुड़वा दिया जाए। अलग बाड़ा बछड़े या बछड़ी को एक दूसरे को चाटने से रोकता है और इस तरह बछड़े या बछड़ी में रोगों के प्रसार की संभावना कम होती है। बछड़े या बछड़ी के बाड़े को साफ-सुथरा, सूखा और अच्छी तरह से हवादार होना चाहिए। वेंटिलेशन से हमेशा ताजी हवा अन्दर आनी चाहिए लेकिन धूलगर्द बछड़ों के आंख में न जाएं इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।  बछड़े या बछड़ी के बाड़े में Viraclean विराक्लीन नियमित रूप से का छिड़काव करनी चाहिये।

बछड़े या बछड़ी के रहने के स्थान पर अच्छा बिछौना होना चाहिए ताकि आराम से और सूखी अवस्था में रह सकें। लकड़ी के बुरादे अथवा पुआल का इस्तेमाल बिछौने के लिए सबसे अधिक किया जाता है। बछड़े के ऐसे बाड़े जो घर के बाहर हों, आंशिक रूप से ढके हुए और दीवार से घिरे होने चाहिए ताकि धूप की तेज गर्मी अथवा ठंडी हवा, वर्षा और तेज हवा से बछड़े की सुरक्षा हो सके। पूरब की ओर खुलने वाले बाड़े को सुबह के सूरज से गर्मी प्राप्त होती है और दिन के गर्म समयों में छाया मिलती है। वर्षा पूरब की ओर से प्राय: नहीं होती।

नवजात बछड़े या बछड़ी को बीमारियों से बचाकर रखना उनकी आरंभिक वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इससे उनकी मृत्यु दर कम होती है, साथ ही बीमारी से बचाव बीमारी के इलाज की तुलना में कम खर्च में किया जा सकता है। बछड़े या बछड़ी का नियमित निरीक्षण करें, उन्हें ठीक तरह से खिलाएं और उनके रहने की जगह और परिवेश को स्वच्छ रखें। कृपया आप इस लेख को भी पढ़ें पशुओं के लिए खनिज लवण का मह्त्व.

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