सूअर पालकों की सफलता की कहानी ,उन्ही के जुबानी !

सूअर पालकों की सफलतासूअर प्रतिनिधित्व करते हैं समृद्धि का’उत्साह से लबरेज़ दलविंदर सिंह कहते हैं, “आपके पास आपके बचपन में एक गुल्लक (पिगी बैंक) जरूर रहा होगा।” ठाठ-बाट वाले इस पंजाबी किसान के लिए सूअर पालन जिंदगी में आगे बढ़ने का नया रास्ता है। घर के पिछले हिस्से में आत्मनिर्भर फूड-चेन और महज ढाई एकड़ जमीन के मालिक दलविंदर सिंह एक बेहद सफल सूअर पालन केंद्र के जरिए सालाना करीब 30 लाख रुपये कमा लेते हैं, जो जमीन के इस छोटे से टुकड़े पर परंपरागत खेती से कभी संभव नहीं है।

एक ठेठ सीमांत किसान दलविंदर सिंह के लिए, जिनके पास पीढ़ियों से बंटती चली आ रही जो थोड़ी बहुत जमीन बची थी, उनके लिए फसल चक्र खेती विकल्प नहीं था। और इस बात को उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था। वो बताते हैं, “साल 1985 में जब मेरे पास जमीन का बड़ा हिस्सा था तब मैंने पूरे साल चार अलग-अलग फसल उगाने की कोशिश की। ये मेरा सफल प्रयास था जिसके लिए मुझे पुरस्कार भी मिला, लेकिन अब मेरे पास महज दो एकड़ जमीन ही बची है और उस पर गेहूं और चावल की खेती से इतना भी अनाज पैदा नहीं होगा कि साल भर अनाज की अपनी ही जरूरत पूरी हो सके!”

डेयरी से सूअर पालन तक का सफर :

साल 1980 में दलविंदर सिंह ने डेयरी व्यवसाय की ओर रुख कर लिया और साल 1990 में उन्हें दूसरा राज्य स्तरीय पुरस्कार मिला, इस बार 65 गाय की मदद से एक दिन में सबसे ज्यादा 500 लीटर दूध उत्पादन के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला। वो डेयरी व्यवसाय में दो दशकों तक बने रहे। वो बताते हैं, “हमारे घर कुराली में हमारे पास मशहूर दूध केंद्र है, जहां हमारे पास डीप फ्रीजिंग सुविधा भी है। दूध के अलावा हम दूसरे डेयरी उत्पाद बेचते हैं।”

कुछ साल पहले पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के वैज्ञानिकों द्वारा सूअर पालन के लिए एक कोशिश किए जाने को लेकर प्रोत्साहित किए जाने के बाद दलविंदर कुछ वक्त तक उलझन में रहे। उस दौर को याद करके दलविंदर बताते हैं, “सूअर को लेकर मेरे भी मन में वैसे ही विचार थे जैसा कि आपके भी मन में भी शायद हो कि वो गंदे होते हैं, गंदगी फैलाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इसे खरीदेगा कौन?”

लेकिन साल 2010 में उस वक्त सब कुछ बदल गया जब दलविंदर ने रूपनगर स्थित किशनपुरा में अपने खेतों के दो कनाल हिस्से में 10 सू्अरों के साथ सूअर पालन का काम शुरू किया। वो बताते हैं, “सूअर बुद्धिमान जानवर होते है, कुत्ते से भी ज्यादा आज्ञाकारी होते हैं। सबसे ज्यादा हैरान करनेवाली बात ये है कि सूअर अपने आस-पास की जगह को साफ-सुथरा रखते हैं। यहां सबसे अच्छी बात ये है कि दोनों ही तरह के सुअरों, छोटे और पूरी तरह व्यस्क सूअरों के लिए भारत में बड़ा बाजार है। शुरुआत में पंजाब से खरीदने वाले केरल, असम और नागालैंड के सूअर के व्यापारी इन्हें ट्रकों के जरिए ले जाते थे, लेकिन उसके बाद वो एक साथ मिलकर धंधा करने लगे और सूअर को ले जाने के लिए ट्रेन की बुकिंग करने लगे। बाजार में मांग इतनी अधिक है कि व्यापारी खुद सुअर पालकों को खोजते हुए आते हैं, हमें बेचने के लिए एक इंच भी नहीं हिलना पडता है।”

सुअर व्यवसाय का अंक-गणित :

दूसरे धंधे के मुकाबले सूअर पालन शुरू करने का अर्थशास्त्र अपेक्षाकृत सरल है। एक पूरी तरह व्यस्क सूअर आठ हजार में खरीदा जा सकता है। वो बताते हैं, “कोई भी व्यक्ति इस धंधे को एक नर और मादा सूअर से शुरू कर सकता है। पंजाब सरकार ने एक बड़ा सफेद यॉर्कशायर नस्ल विकसित किया है जिसे सरकारी केंद्रों से खरीदा जा सकता है। एक बार में आधा दर्जन के करीब सूअर के बच्चे पैदा होते हैं इसलिए पहले तीन महीने में ही आपके पास 10 सूअर हो जाएंगें।

सूअर का एक बच्चा करीब ढाई से तीन हजार रुपये में बिक जाता है और उससे थोड़ा और बड़ा सूअर का एक बच्चा 7 से 8 हजार में बिक जाता है। शुरुआत में पानी की आपूर्ति से जुड़े एक छोटे से शेड की जरुरत होती है जिसके लिए सरकार मोटी सब्सिडी देती है। बाद में इस शेड को और विस्तार किया जा सकता है।”

दलविंदर के पास अपने सूअर प्रजनन केंद्र में 50 सूअर है, जहां आधिकांश मादा सूअरों के साथ कुछ नर सूअर भी रखे जाते हैं और सूअर पालन केंद्र को सूअर के बच्चे बेचे जाते हैं। दलविंदर कहते हैं, “हम लोग सूअरों के प्रजनन के लिए प्राकृतिक तरीका अपनाते आये हैं लेकिन अब कृत्रिम गर्भाधान तरीका भी संभव हो गया है। सूअर की प्रजनन वृद्धि दर बहुत तेज है और एक साल में एक मादा सूअर तीन से चार बार बच्चा दे सकती है।” दलविंदर सिंह के फार्म में प्रति साल एक हजार सूअर पैदा हो रहे हैं जिससे वो करीब 28 से 30 लाख रुपये आसानी से कमा लेते हैं। धंधे की लागत ज्यादा नहीं

सूअर पालन के क्षेत्र में मजदूरी का खर्च ज्यादा नहीं है। पूरे फार्म को दलविंदर अपने बेटे, जो अभी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, और एक सहायक की मदद से आसानी से चलाते हैं। वो बताते हैं, “फार्म पर हमेशा एक नौकर रहता है और दिन के वक्त हम लोग साथ रहते हैं। मैं सूअर का वैक्सीनेसन यानी प्रतिरक्षा का टीका खुद लगाते हैं, सहायक और मैं सूअर के होनेवाले बच्चे को संभालने के लिए प्रशिक्षित हैं। जब बच्चे छोटे रहते हैं तब हम उसके बाहरी दांत तोड़ देते हैं ताकि जब वो आपस में लड़ें तो एक-दूसरे को घायल ना कर सकें। वहीं, सूअर को नहलाने और साफ करने का काम मेरा बेटा खुशी-खुशी कर लेता है”। वो ये भी बताते हैं, “सूअर से मिलनेवाले फायदे के साथ-साथ मैं अपने पास मौजुद पशुओं की संख्या कम करता जा रहा हूं और उसके बाद हम बहुत जल्द पूरी तर से सूअर पालन पर पर शिफ्ट हो जाएगे। और जल्द ही पशुओं को हटाने से खाली हुए जगहों का इस्तेमाल हम वयस्क, विकसित यानी मोटे सूअरों के विकास पर करेंगे”। मोटे और विकसित सूअर को खिलाने-पिलाने कोई परेशानी नहीं होती है और उनका घरेलू जूठन (हाउसहोल्ड वेस्ट) से भी काम चल जाता है। जब वो पूरी तरह विकसित और बड़े हो जाते हैं तब उन्हें बेच दिया जाता है। वो बताते हैं, “प्रजनन केंद्र चलाने के मुकाबले मोटे सूअरों को पालने का धंधा ज्यादा आसान है और पूरे राज्य में आज इसी तरह का ट्रेंड चल रहा है” पंजाब में आज करीब 60 सूअर फार्म चल रहे हैं जिसके बूते यहां के किसान भव्य और बेहतरीन जिंदगी बिता रहे हैं।

सुनहरा मौका हाथ से जाने दें”

सूअर किसान संघ के सचिव दलविंदर चाहते हैं कि दूसरे सीमांत किसान भी सूअर पालन व्यवसाय की ओर रुख करें। वो बताते हैं, “जितनी जमीन मेरे पास है और उस पर जो कमाई होती उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती है। दो एकड़ जमीन पर खेती करने से मैं एक साल में एक लाख रुपये कमा लेता। सूअर पालन को प्रोत्साहित करनेवाले सरकारी कार्यक्रम में जब मैं गया तो मैं अन्य किसानों को बताता हूं कि एक कनाल सूअर फार्मिंग से वो इतना कमा लेंगे जितना कि वो 42 एकड़ जमीन में खेती करने से कमा सकते हैं।”

हालांकि, सूअर पालन के धंधे में उतरनेवाले को दलविंदर सावधान करना नहीं भूलते हैं और कहते हैं कि इस धंधे में उतरने से पहले प्रशिक्षण बेहद जरूरी है। महज दसवीं पास दलविंदर ने खरार में स्थित सरकारी सूअर पालन केंद्र (पीएयू) के साथ-साथ गुवाहाटी और बरेली के संस्थान से प्रशिक्षण लिया है। सूअरों के टीकाकरण के साथ साथ उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखने की जरूरत होती है क्योंकि उनके मांस को खाया जाता है। इससे पहले की सुअर मानव खाद्य ऋंखला का हिस्सा बनें मैं ये सुनिश्चित करना चाहता हं कि वो पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन वहीं, चिंता की बात ये है कि ऐसे कई किसान हैं जो मोटे-तगड़े यानी वयस्क सूअर का कारोबार कर रहे हैं और वो भी बिना किसी प्रशिक्षण के, जो ठीक नहीं है”।

ये प्रशिक्षण का ही कमाल था कि उन्होंने गाय और जमीन को मिलाकर एक ऐसा फूड चेन तैयार कर लिया जिससे सूअर पालन के धंधे के लागत में भी कमी आई। अपना अनुभव बांटते हुए वो कहते हैं, “मेरे पास जो जमीन है मैं उसमें पशुचारे को पैदा करता हूं। इससे मेरे पास मौजुद 14 गायों की जरूरत पूरी हो जाती है। इनसे मुझे करीब 100 लीटर दूध मिल जाता है जिसे बेचने से इतनी आमदनी हो जाती है कि आसानी से सूअरों का चारा खरीद लेता हूं।

सूअर के अपशिष्ट को वापस खेत में डाल देते हैं जो पशुचारे के लिए ऊर्वरक का काम करता है। यह सब पर्याप्त होता है और मुझे बाजार से ऊर्वरक खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। जो कुछ भी मैं सूअर बेच कर कमाता हूं वो पूरा का पूरा शुद्ध मुनाफा होता है।”

अगला लक्ष्य- मछली पालन :

दलविंदर के बेटे अत्तर सिंह अपने धंधे का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं। अत्तर कहते हैं, “यह फलने-फूलनेवाला धंधा है और हम जितना पैदा करते हैं उतना ही ज्यादा कमाते भी हैं। इसीलिये हमने हाल ही में कुराली से फार्म तक जाने के लिए एक नई कार (हुंदई की हैचबैक आई10) खरीदी है” अत्तर अपनी योजना के बारे में बताते हुए कहते हैं, “सूअरों के लिए अगला आत्मनिर्भर फूड चेन तैयार करने के लिए मुझे पांच एकड़ जमीन चाहिए जिस पर मैं एक तालाब तैयार कर सकूं और मछली पाल सकूं। जो घास-फूस या शैवाल तालाब में पैदा होता है वो सूअरों के चारे के लिए बेहतरीन हैं। मैंने इस तरह का प्रयोग छोटे से तालाब में किया है लेकिन मुझे अपने प्रोजक्ट शुरू करने के लिए लीज पर और भी जमीनें चाहिए”।

वो कहते हैं, जिस तरह सूअर की बिक्री होती है वैसे ही मछली भी बिक जाता है। “और अगर मैं इन दोनों को फूड चेन से मिला दूं तो यह निवेश की सीमा को न्यूनतम कर देगा।” लेकिन दलविंदर फिलहाल 50 सूअरों का मालिक होने पर फक्र महसूस करते हैं जिसने उनके लिए पिग्गी बैंक या गुल्लक का काम किया है। वो लगभग सभी अवॉर्ड हासिल कर चुके हैं, खासकर साल 2011 से वो लगभग हर साल कोई न कोई अवॉर्ड जीतते आ रहे हैं। इसमे 2014 में राज्य का वह पुरस्कार भी शामिल है जो उन्हें सूअर पालन का धंधा सबसे सफल तरीके से चलाने के लिए मिला है। वो सूअर सलाहकार बोर्ड (पिग अडवाइजरी बोर्ड) के सदस्य भी हैं जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल हैं। वो अपनी प्रशंसा करते हुए बताते हैं, “सभी सदस्यों में से ‘बादल साब’ सिर्फ मुझे ही मेरे नाम से जानते हैं और किसानों के लिए सुअर पालन का धंधा लाभदायक बताने वाले मेरे आइडिया से काफी प्रभावित हैं”।

सूअर पालन का अर्थशास्त्र :

पूरी तरह विकसित सूअर की कीमत 8 हजार रुपये, महज एक नर और एक मादा से कोई भी इस धंधे को शुरु कर सकता है। एक बार में छह या इससे ज्यादा सूअर के बच्चे पैदा होते हैं, इस तरह तीन महीने के अंदर 10 सूअर हो जाता है। सूअर का एक बच्चा करीब ढाई हजार रुपये में बिकता है, पूर्ण विकसित सूअर आठ हजार रुपये में तक बिकता है। दो एकड़ जमीन पर एक बार में 50 सूअर का पालन हो सकता है। एक साल में एक हजार सूअर का उत्पादन कर 30 लाख रुपये कमाई की जा सकती है।

खेती से कई गुना फायदेमंद सूअर पालन :

सूअर पालन किसान एसोसिएशन के सचिव दलविंदर सिंह कहते हैं, “सूअर पालन व्यवसाय की तुलना परंपरागत खेती-बाड़ी और उससे हासिल की गई आमदनी से बिल्कुल नहीं की जा सकती है।” वो यह भी बताते हैं, “एक एकड़ क्षेत्र में गेहूं-चावल की सालाना खेती से एक लाख 20 हजार की आमदनी होती है। वहीं, अगर सूअर पालन का धंधा एक कनाल फार्म में अच्छी तरह से किया जाएगा तो वो 42 एकड़ की खेती के बराबर होता है।”

सूअर पालन में सरकारी सहायता :

सूअर पालन व्यवसाय की ओर किसानों को आकर्षित करने के लिए  पशुपालन विभाग फ्री में अपने किसी सूअर पालन केंद्र पर दो से तीन सप्ताह का प्रशिक्षण देता है। फार्म की शुरुआत करने के लिए पशुपालन विभाग की ओर से सूअर के बच्चे का पहला सेट बहुत ही कम कीमत पर दिया जाता है। सरकार शेड के निर्माण में आने वाली लागत पर 25 फीसदी तक सब्सिडी यानी छूट देती है। नाबार्ड सुअर पालन प्रोजेक्ट रिपोर्ट डाउनलोड करें । कृप्या आप इस लेख को भी पढ़ें सूकर पालन कैसे करें ?

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