ब्रॉयलर मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय

ब्रॉयलर मुर्गीपालन

ब्रॉयलर मुर्गीपालन व्यवसाय मीट  के ही उत्पादन के लिए किया जाता है। ऐसा देखा गया है कि ब्रॉयलर मुर्गीपालन यानि मीट उत्पादन अण्डा उत्पादन से लाभकारी है । इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ब्रॉयलर मुर्गीपालन के लिए चूज़े 40-45 दिनों में तैयार हो जाते हैं जबकि अण्डा उत्पादन के लिए तैयार होने में मुर्गियों को साढ़े पांच महीने तक लग जाते हैं।

ऐसे मुर्गे जिन्हें सिर्फ मीट प्राप्त करने के लिए पाला जाता है, उन्हें ब्रॉयलर मुर्गी कहते हैं। इन मुर्गों का पालन ही ब्रॉयलर मुर्गीपालन कहा जाता है। ये खास किस्म के मुर्गे होते हैं जिनकी शरीरिक बढ़त बहुत तेजी से होती है। ब्रॉयलर मुर्गीपालन व्यवसाय को छोटे स्तर से शुरू करके, अंशकालिक व्यवसाय के तौर पर भी अपनाया जा सकता है।

लखनऊ की पूर्व दिशा में लगभग 28 किलोमीटर दूर बसे चांदसराय गाँव के निवासी मकसूद खान (24) पिछले पांच सालों से ब्रॉयलर मुर्गीपालन कर रहे हैं। मकसूद के पिता ने बीस साल पहले इस व्सवसाय को शुरू किया था और अब मकसूद इसे संभाल रहे हैं। मकसूद बताते हैं, ”हमने 500 पक्षियों से पालन शुरू किया था, फिर जब धीरे-धीरे मुनाफा बढऩे लगा तो हम इनकी संख्या बढ़ाते गए, आज हमारे पास 12-13 हजार पक्षी हैं।” मकसूद के फार्म में 13 हजार पक्षियों की देखभाल चार लोग मिलकर करते हैं। उन्हें देखकर आस-पास के क्षेत्र में कई लोग ब्रॉयलर मुर्गीपालन करने लगे हैं।

ब्रॉयलर मुर्गीपालन व्यवसाय की अच्छाईयों के बारे में बताते हुए मकसूद कहते हैं, ”इसमें ज्य़ादा खर्च नहीं आता है, और कुछ ही दिनों में बिक्री भी शुरु हो जाती है। एक पक्षी लगभग 70 रुपये में तैयार हो जाता है, और एक मुर्गे से एक किग्रा मीट मिलता है जो कि कम से कम 130 रुपए किलो बाज़ार में बिक ही जाता है।”

ब्रॉयलर मुर्गीपालन के क्षेत्र में अभी उत्तर प्रदेश में बहुत काम किया जाना बाकी है। देश भर में ब्रॉयलर मुर्गीपालन में प्रदेश का छठा स्थान है।
ब्रॉयलर मुर्गीपालन से मुनाफे के बारे में जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग के मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ वीके सिन्हा बताते हैं, ”वर्तमान समय में लगभग 1000 लाख ब्रायलर के चूजे उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में प्रतिवर्ष पाले जा रहे हैं। इसमें पालक को ज्यादा और जल्दी मुनाफा होता है, क्योंकि इसमें पक्षी 40-45 दिन में ब्रिकी के लिए तैयार हो जाते हैं जबकि अंडा उत्पादन में साढ़े पांच महीने लग जाते हैं तब वह अण्डा देना शुरू करती है।ÓÓ

ब्रॉयलर मुर्गीपालन के समय इन बातों का रखें ध्यान:

चूजों का चुनाव
ब्रॉयलर मुर्गीपालन में चूजों का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है। चुस्त, फुर्तीले, चमकदार आंखों वाले तथा समान आकार के चूजे उत्तम होते हैं। स्वस्थ चूजों की पिण्डली या पैर की खाल चमकदार होती है। चूजों को खरीदते समय ये ध्यान रखें कि पक्षियों के वजन में अन्तर न हो क्योंकि वजन में जितना अन्तर होगा आमदनी उतनी घटती चली जाती है। चूजे किसी भी मान्यता प्राप्त व्यक्तिगत अथवा सरकारी संस्था से खरीदे जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश के छोटे पालकों के लिए ब्रायलर प्रजातियां उपयुक्त प्रजातियां हैं कारीब्रो-विशाल, कारीरेनब्रो, कारीब्रो- मुत्युंजय और बड़े पालकों के लिए वैनकॉक, हबबर्ड, पोनिक्स आदि प्रजातियां है।

ब्रॉयलर मुर्गीपालन के लिए आवास की व्यवस्था

ब्रॉयलर मुर्गीपालन के लिए मुख्य तौर पर दो प्रकार के घर तैयार किये जाते हैं।

पिंजरा सिस्टम इसमें पक्षियों की ब्रूडिंग स्थिति (झुंड में रखने की अवस्था) में 0.25 वर्ग फीट प्रति चूजा स्थान होना चाहिए और बढ़वार की स्थिति में आधा वर्ग फीट प्रति ब्रायलर चूजे के लिए स्थान होना चाहिए।

डीप लिटर सिस्टम इसमें फर्श पर पालन किया जाता है। इसमें ब्रूडिंग स्थिति में प्रति ब्रायलर चूज़े का स्थान 0.50 वर्ग फीट होना चाहिए और बढ़वार की स्थिति में 1.00 वर्ग फीट होना चाहिए।

तापमान का प्रबंधन
चूज़ों को ब्रूडर में रखने के बाद ये देखना चाहिए कि तापमान उनके लिए उपयुक्त है या नहीं क्योंकि तापमान की कमी और अधिकता से चूजों की बढ़वार पर बुरा प्रभाव पड़ता है। तापमान परिवर्तित होने पर चूज़े असहजता के कारण अजीब तरह की गतिविधियां करने लगते हैं। गर्मी ज्यादा होने पर बाड़े में कूलर की व्यवस्था ज़रूर कर दें। जब नए चूजों को बाड़े में रखा जाता है तो शुरुआति दो-तीन दिनों तक बाड़े में 33 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान बनाए रखें और इस अवस्था के बाद बाड़े का तापमान 21 डिग्री सेन्टीग्रेड बनाए रखना होता है।

आद्र्रता से चूज़ों में सांस संबंधी समस्या
नमी बढऩे पर चूज़ों का बिछावन गीला हो जाता है जिससे सांस सम्बंधी कई समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसलिए आद्र्रता 50 से 60 प्रतिशत से ज्यादा होने पर उनका बिछावन समय-समय पर बदलना चाहिए।

हवा का आवागमन
चूजों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए हवा का उचित आवागमन बहुत आवश्यक होता है। प्रति घंटे 3 से 5 बार कमरे की हवा को परिवर्तित करना चाहिए। पक्षियों के मूत्र से बिछावन भीग जाता है जिससे अमोनिया गैस इक्ट्ठा हो जाती है। इससे पक्षियों की आंखों में खुजलाहट होती है और शारीरिक वृद्घि भी रुक सकती है इसलिए हवा के आवागमन का खास ध्यान रखना चाहिए।

रोशनी की व्यवस्था
ब्रॉयलर मुर्गी आवास में प्रकाश का प्रबंध आमतौर पर बल्ब से किया जाता है। 23 घंटे लगातार बाड़े में प्रकाश बनाए रखें और सिर्फ एक घंटा अंधेरा रखें, चाहे वह आवास खुले हों या बंद। शुरुआत के एक से 15 दिन तक 200 वर्ग फीट आकार के कमरे में 40-60 वॉट के बल्ब का प्रयोग करना चाहिए। इसके बाद 15 वॉट का बल्ब प्रकाश के लिए काफी होता है।

शुरुआत के दिनों में दें पोषक आहार
ब्रॉयलर मुर्गी को शुरू से ही भर पेट खिलाएं जिससे वे तेजी से बढ़ेंगे। ब्रायलर चूजे अंडे देने वाली मुर्गी की तुलना में काफी तेजी से बढ़ते हैं। वृद्घि की गति को ध्यान में रखकर इनके लिए दो प्रकार के आहार उपयोग में लाये जाते हैं-
स्टार्टर आहार चूजों को शुरुआति दिनों में दिए जाने वाले आहार को स्टार्टर कहते हैं। बाड़े में रखने के चार सप्ताह में ब्रायलर को स्टार्टर आहार दिया जाता है, जिसमें करीब 23 फीसदी प्रोटीन और करीब 3000 कैलोरी उर्जा होती है। इससे पक्षियों का वजन और मांसपेशियों का विकास तेजी से होता है।
फिनिशर आहार पक्षी को चार सप्ताह के बाद से फिनिशर आहार देना होता है। इसमें ऊर्जा की मात्रा में तो कोई परिवर्तन नहीं होता है लेकिन प्रोटीन की मात्रा घटा दी जाती है।

टीकाकरण
ब्रॉयलर मुर्गी का टीकाकारण कराना सबसे आवश्यक है क्योंकि इससे मुर्गे गंभीर बीमारियों से बचे रहते हैं।
मैरेक्स टीका: चूजों को सबसे पहले मैरेक्स का टीका लगवाना चाहिए जिससे उन्हें मैरेक्स बीमारी से सुरक्षा मिल सके। यह संक्रामक रोग चूजों को ही लगता है इसलिए चूज़ों को हैचरी से बाड़े में रखने पर यह टीका लगवाना बहुत जरुरी है। इस रोग का प्रकोप होने पर उनकी टांगे और गर्दन कमजोर हो जाती है।
लसोटा: इसका टीका चूज़ों को 5-6 दिन पर लगवा देने से लसोटा, आरडीएफ-1 जैसे रोग नहीं होते हैं। इन रोगों से पक्षी को कुपोषण की दिक्कत हो जाती है और इनका वजन नहीं बढ़ता है।
गम्बोरो: इसका टीका 12-18 दिन पर लगवाया जाता है। इस रोग में पक्षियों के शरीर में गाठे पड़ जाती है जिससे उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है।

ब्रॉयलर मुर्गीपालन को अधिक लाभप्रद बनाने के लिए

  1. जब ब्रायलर 6 या 8 सप्ताह में निश्चित भार के हो जायें तो जल्दी से जल्दी बेच देना चाहिए क्योंकि उसके बाद वे दाना खाकर कम बढ़ते हैं।
  2. हमेशा ग्रोवेल एग्रोवेट का  ग्रोथ प्रमोटर ,लिवर टॉनिक,कैल्शियम,विटामिन,मिनरल्स और एंटीबायोटिक दें , केवल दवा ही न दें उसके रिज़ल्ट को परखें की दवा का प्रभाव है या नहीं ।ग्रोवेल एग्रोवेट की दवा और ग्रोथ प्रमोटर १०० % प्रभावकारी है और रिजल्ट ३ से ४ दिनों में दिखाई देने लगता है ।

कुछ खास बातें
1. जितनी जल्दी हो सके चूजों को हैचरी से लाकर ब्रूडर में रखना चाहिए। अगर चूजे बाहर से मंगाने हैं तो यह सावधानी बरतनी चाहिए कि चूजे 24 घंटे के अन्दर ही ब्रूडर तक पहुंच जाएं।
2. जब तक चूजे दो से तीन घंटे तक पानी न पी लें तब तक दाने के बर्तनों को ब्रूडर में न रखें।
3. मरे या अस्वस्थ चूजों को जितनी जल्दी हो सके हटा देना चाहिए।
4. फार्म को आबादी से दूर रखें।
5. फार्म में लोगों को आवागमन न हो।

ब्रॉयलर चूज़ों की उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास
उत्तर प्रदेश में हर साल लगभग 1000 लाख चूज़े ब्रॉयलर पालन के लिए आयातित किए जाते हैं क्योंकि प्रदेश में ब्रॉयलर पैरेण्ट फार्म कम हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए प्रदेश में कुक्कुट नीति-2013 के तहत नए उद्यमियों की मदद करके 06 लाख ब्रायलर पैरेण्ट फार्म की स्थापना पांच वर्षों के भीतर करने का लक्ष्य रखा गया है। ब्रायलर पैरेण्ट फार्म की एक इकाई में 10 हजार पैरेण्ट ब्रायलर रखे जायेंगे। लाभार्थी को इस इकाई को स्थापित करने के लिए सरकारी सहायता से बैंक ऋ ण दिलवाया जाएगा जिस पर 5 वर्ष में 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर लागू होगी।

कृपया आप इसे भी पढ़ें हिन्दी में पशुपालन और मुर्गीपालन पुस्तिका

 

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